वाच्य (कक्षा सातवी)

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वाच्य

धीरा जूते पॉलिश करता था।
धीरा द्वारा जूते पॉलिश किये जाते थे।
धीरा से रहा नहीं गया।
उपर्युक्त पहले वाक्य में क्रिया कर्त्ता (धीरा) के अनुसार है, दूसरे वाक्य में क्रिया कर्म (जूते) के अनुसार है तथा तीसरे वाक्य में कर्म नहीं है अर्थात यहाँ भावों (रहा नहीं गया) की ही प्रधानता है।

अतएव क्रिया के जिस रूप से यह जाना जाये कि क्रिया कर्त्ता के अनुसार है या कर्म के अनुसार है या भाव के अनुसार है, उस रूप को वाच्य कहते हैं।

इस तरह वाच्य तीन प्रकार के होते हैं :-
1. कर्तृवाच्य,  2.कर्मवाच्य,  3.भाववाच्य

(i) धीरा धुन गुनगुना रहा था।
(ii) धीरा द्वारा धुन गुनगुनायी जा रही थी।
पहले वाक्य में कर्त्ता (धीरा) प्रधान है और क्रिया का लिंग (गुनगुना रहा था) एवं वचन उसी कर्त्ता के अनुसार है।
अतएव क्रिया के जिस रूप में कर्त्ता प्रधान हो, उसे कर्तृवाच्य कहते हैं।

दूसरे वाक्य में क्रिया (गुनगुनायी जा रही थी) का लिंग एवं वचन कर्त्ता (धीरा) के अनुसार न होकर कर्म (धुन) के अनुसार है, यहाँ क्रिया कर्म वाच्य है।
अतएव क्रिया के जिस रूप में कर्म प्रधान हो, उसे कर्मवाच्य कहते हैं।

(iii) धीरा से रहा नहीं गया।
तीसरे वाक्य में ‘रहा नहीं गया’ क्रिया का भाव ही मुख्य है। क्रिया अकर्मक है जो अन्य पुरुष, पुल्लिंग, एकवचन में है।
अतएव क्रिया के जिस रूप में क्रिया के भाव की प्रधानता के कारण अकर्मक क्रिया का प्रयोग हो और जो सदैव अन्य पुरुष, पुल्लिंग तथा एकवचन में हो, उसे भाववाच्य कहते हैं ।

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