11. आदमी का अनुपात और पन्द्रह अगस्त (गिरिजा कुमार माथुर)
कवि परिचय एवं कविताओं का संक्षिप्त परिचय
कवि गिरिजा कुमार माथुर गहरे आत्म संवेदन तथा आधुनिक अनुभूतियों के कवि हैं। वे प्रयोगवाद तथा नई कविता के समर्थक कवि हैं। उनकी कविताओं में रस-रोमांच, युग का यथार्थ तथा वैज्ञानिक चेतना भी दिखाई देती है।
प्रस्तुत संकलन में उनकी दो कविताएँ शामिल हैं। पहली कविता ‘आदमी का अनुपात’ में कवि ने अपनी संकीर्ण सोच से बँधे मानव के प्रति संकीर्ण सोच को कविता का मुख्य प्रतिपाद्य बनाया है। कवि के अनुसार इस नभ-गंगा की विस्तृत परिधि में लाखों ब्रह्मांडों के मध्य आदमी का अनुपात (अस्तित्व) तुच्छ और नगण्य है। दूसरी कविता ‘पन्द्रह अगस्त’ में कवि राष्ट्रवासियों को संबोधित करते हुए कहते हैं कि स्वतंत्रता प्राप्त करने से भी बड़ा कार्य स्वाधीनता को बनाए रखना है। कवि राष्ट्रवासियों को सीमाओं पर खड़े शत्रु और आंतरिक शत्रुओं जैसे अव्यवस्था, शोषण, सांप्रदायिकता और वैमनस्य की भावना से सावधान रहने की प्रेरणा देते हैं।
2. पद्यांशों का सप्रसंग व्याख्या
2.1. आदमी का अनुपात
पद्यांश 1
दो व्यक्ति कमरे में
कमरे से छोटे,
कमरा है घर में
घर है मोहल्ले में
मोहल्ला नगर में
नगर है प्रदेश में
प्रदेश कई देश में
देश कई पृथ्वियों पर
अनगिन नक्षत्रों में
पृथ्वी एक छोटी
करोड़ों में एक ही
सबको समेटे है।
परिधि नभ-गंगा की
लाखों ब्रह्मांडों में
अपना एक ब्रह्मांड
हर ब्रह्मांड में
कितनी ही पृथ्वियाँ
कितनी ही भूमियाँ
कितनी ही सृष्टियाँ
यह है अनुपात।
प्रसंग: यह प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक 12′ में संकलित श्री गिरिजा कुमार माथुर द्वारा रचित कविता ‘आदमी का अनुपात‘ में से लिया गया है। इस अंश में कवि ने ब्रह्मांड की विशालता के संदर्भ में मनुष्य के अस्तित्व की अत्यंत सीमितता (तुच्छ अनुपात) को एक क्रम से दर्शाया है।
व्याख्या: कवि मनुष्य के अस्तित्व के दायरे का वर्णन करते हैं, जो अत्यंत सीमित है। दो व्यक्ति एक छोटे से कमरे में रहते हैं। कमरा घर में है, घर एक मोहल्ले में है, मोहल्ला नगर में, नगर प्रदेश में है। कई प्रदेश मिलकर देश बनाते हैं, और कई देश करोड़ों प्राणियों को समेटने वाली एक छोटी सी पृथ्वी पर स्थित हैं। यह पृथ्वी स्वयं अनगिनत नक्षत्रों में स्थित है। इसके बाद कवि ब्रह्मांड की ओर संकेत करते हैं कि नभ-गंगा (आकाशगंगा) की विशाल परिधि (सीमा) में लाखों ब्रह्मांड हैं। हर ब्रह्मांड स्वयं में एक अलग ब्रह्मांड है, जिसमें न जाने कितनी पृथ्वियाँ, भूमियाँ और सृष्टियाँ मौजूद हैं। कवि निष्कर्ष निकालते हैं कि इस विशालता के सामने मनुष्य का यह सीमित अस्तित्व ही उसका अनुपात है, जो बहुत नगण्य है।
पद्यांश 2
आदमी का विराट में।
इस पर भी आदमी।
ईर्ष्या, अह, स्वार्थ, घृणा, अविश्वास लीन
संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है
अपने को दूजे का स्वामी बताता है
देशों की कौन कहे
एक कमरे में
दो दुनिया रचता है।
प्रसंग: यह प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक 12′ में संकलित श्री गिरिजा कुमार माथुर द्वारा रचित कविता ‘आदमी का अनुपात‘ में से लिया गया है। कवि इस अंश में ब्रह्मांड में मनुष्य के नगण्य (तुच्छ) अस्तित्व के बावजूद उसकी संकीर्ण सोच, अहंकार (अह) और आपसी द्वेष में लीन रहने की प्रवृत्ति का चित्रण कर रहे हैं।
व्याख्या: कवि कहते हैं कि विराट (विशाल) ब्रह्मांड के सामने मनुष्य का अस्तित्व जब इतना तुच्छ है, फिर भी आदमी ईर्ष्या, अहंकार, स्वार्थ, घृणा और अविश्वास में लीन रहता है। वह अपनी सीमित दुनिया में रहते हुए भी स्वार्थ की असंख्य (संख्यातीत अर्थात अनगिनत) दीवारों से खुद को घेरे रहता है और अपने आपको दूसरों का स्वामी बताता है। कवि दुख व्यक्त करते हैं कि बड़े देशों की बात तो दूर, वह केवल एक छोटे से कमरे में ही आपसी द्वेष के कारण दो अलग-अलग दुनियाएँ (संघर्ष की दुनिया) रच डालता है।
2.2. पन्द्रह अगस्त
पद्यांश 1
आज जीत की रात
पहरुए, सावधान रहना।।
खुले देश के द्वार
अचल दीपक समान रहना
प्रथम चरण है नये स्वर्ग का
है मंज़िल का छोर
इस जन-मंथन से उठ आई
पहली रत्न हिलोर
अभी शेष है पूरी होना
जीवन-मुक्ता डोर
क्योंकि नहीं मिट पाई दुःख की
विगत साँवली कोर ले
युग की पतवार।
प्रसंग: यह प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक 12′ में संकलित श्री गिरिजा कुमार माथुर द्वारा रचित राष्ट्रवादी कविता ‘पन्द्रह अगस्त‘ में से लिया गया है। कवि स्वतंत्रता की प्राप्ति को केवल मंजिल की शुरुआत मानते हुए देश के रक्षकों (पहरुए अर्थात् देश के रक्षक) को सावधान रहने और नए युग की जिम्मेदारी उठाने का आह्वान कर रहे हैं।
व्याख्या: कवि राष्ट्र के पहरुओं (रक्षकों) को संबोधित करते हुए कहते हैं कि आज स्वतंत्रता की जीत की रात है, लेकिन तुम्हें सावधान रहना होगा। देश के सभी द्वार खुल गए हैं (अवसर और विकास के रास्ते खुले हैं), इसलिए हमें अचल दीपक (स्थिर ज्योति) के समान बने रहना है। यह स्वतंत्रता नए स्वर्ग की ओर पहला कदम है, और यह केवल मंजिल का किनारा (छोर) मात्र है। इस जन-क्रांति (जनमंथन) से पहली रत्न जैसी खुशी की लहर उठी है। लेकिन जीवन की पूर्ण स्वतंत्रता (जीवन-मुक्ता डोर) अभी पूरी तरह से प्राप्त होनी बाकी है। इसका कारण यह है कि प्राचीन दुखों और गुलामी के इतिहास (विगत साँवली कोर) को अभी पूरी तरह से मिटाया नहीं जा सका है। इसलिए, हमें नए युग की पतवार संभालनी होगी।
पद्यांश 2
बने अंबुधि महान रहना।
पहरुए, सावधान रहना।।
विषम श्रंखलाएँ टूटी हैं
खुली समस्त दिशाएँ
आज प्रभंजन बनकर चलती
युग-बन्दिनी हवाएँ
प्रश्न चिह्न बन खड़ी हो गई।
यह सिमटी सीमाएँ
आज पुराने सिंहासन की
टूट रहीं प्रतिमाएँ
उठता है तूफान, इन्दु तुम
दीप्तिमान रहना
पहरुए, सावधान रहना।।
प्रसंग: यह प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक 12′ में संकलित श्री गिरिजा कुमार माथुर द्वारा रचित कविता ‘पन्द्रह अगस्त‘ में से लिया गया है। कवि राष्ट्रवासियों को समुद्र (अंबुधि) के समान महान और गंभीर बने रहने की प्रेरणा देते हैं, क्योंकि स्वतंत्रता के साथ पुरानी रूढ़ियाँ टूट रही हैं और नई चुनौतियाँ सामने खड़ी हैं।
व्याख्या: कवि देश के रक्षकों से कहते हैं कि तुम्हें समुद्र (अंबुधि) के समान महान बने रहना है और सावधान रहना है। गुलामी की कठिन जंजीरें (विषम श्रंखलाएँ) टूट गई हैं और सभी दिशाएँ खुल गई हैं। आज हम जन-क्रांति (प्रभंजन) बनकर आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन सदियों पुरानी मान्यताओं (युग-बंदिनी) ने प्रश्न चिह्न खड़े कर दिए हैं। पुरानी और संकुचित सीमाएँ टूट रही हैं। पुराने सिंहासन अर्थात पुरानी मान्यताओं की प्रतिमाएँ भी ढह रही हैं। क्रांति का तूफान (ज्वार) उठ रहा है। हे चंद्रमा (इन्दु), तुम प्रज्वलित (दीप्तिमान) बने रहना। हे रक्षकों, सावधान रहना।
पद्यांश 3
ऊँची हुई मशाल हमारी
आगे कठिन डगर है
शत्रु हट गया लेकिन उसकी
छायाओं का डर है
शोषण से मृत है समाज
कमज़ोर हमारा घर है
किन्तु आ रही नई ज़िन्दगी
यह विश्वास अमर है
जनगंगा में ज्वार लहर,
तुम प्रवाहमान रहना
पहरुए, सावधान रहना।।
प्रसंग: यह प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक 12′ में संकलित श्री गिरिजा कुमार माथुर द्वारा रचित कविता ‘पन्द्रह अगस्त‘ में से लिया गया है। कवि स्पष्ट करते हैं कि बाहरी शत्रु के हटने के बावजूद, आंतरिक कमजोरियाँ (जैसे शोषण) अभी भी मौजूद हैं। इसलिए, जनता को गतिशील (प्रवाहमान) और आशावान बने रहना होगा।
व्याख्या: कवि कहते हैं कि हमने स्वतंत्रता की मशाल तो ऊँची कर ली है, लेकिन आगे का रास्ता (डगर) अभी भी कठिन है। बाहरी शत्रु भले ही हट गया हो, लेकिन हमें अभी भी उसकी छायाओं का डर है (अर्थात् पिछली गुलामी के प्रभाव से मुक्त होना बाकी है)। हमारा समाज शोषण (दमन) से मृत और कमजोर है, जिससे हमारा देश (घर) कमजोर हो गया है। किंतु, कवि को यह अमर विश्वास है कि एक नई ज़िन्दगी आ रही है। जन-क्रांति (जनगंगा) में उत्साह का ज्वार (तूफान) उठा हुआ है। हे नई ऊर्जा की लहर, तुम निरंतर गतिशील (प्रवाहमान) रहना। हे रक्षकों, सावधान रहना।
3. अभ्यास में दिए गए प्रश्नों के उत्तर
(क) (लगभग 40 शब्दों में उत्तर दें)
प्रश्न 1: ‘आदमी का अनुपात‘ कविता में कवि ने मानव की संकीर्ण सोच और उसकी अह की भावना का चित्रण किया है। अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर: कवि ने चित्रण किया है कि विराट ब्रह्मांड में मनुष्य का अस्तित्व नगण्य है, फिर भी वह अह (अहंकार), स्वार्थ, ईर्ष्या और अविश्वास में लीन रहता है। वह सीमित दायरे में ही संख्यातीत (अनगिनत) दीवारें खड़ी करके खुद को दूसरों का स्वामी बताता है और संघर्ष की दुनिया रचता है।
प्रश्न 2: विशाल संसार में मनुष्य का अस्तित्व क्या है? प्रस्तुत कविता के आधार पर लिखो।
उत्तर: प्रस्तुत कविता के आधार पर, नभ-गंगा की लाखों ब्रह्मांडों की परिधि (सीमा) में मनुष्य का अस्तित्व (अनुपात) अत्यंत तुच्छ और नगण्य है। कवि दर्शाता है कि अनगिनत सृष्टियों के सामने आदमी का दायरा दो कमरों जितना सीमित है।
प्रश्न 3: ‘आदमी का अनुपात‘ कविता का सार अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर: इस कविता का सार मानव के अस्तित्व की तुच्छता को ब्रह्मांड की विशालता से तुलना करके दर्शाना है। कवि यह चित्रित करते हैं कि सीमित अस्तित्व वाला मानव भी अहंकार और आपसी विद्वेष के कारण एक-दूसरे पर प्रभुत्व जमाने की कोशिश करता है, जिससे वह स्वार्थ की दीवारों में कैद रहता है।
प्रश्न 4: ‘पन्द्रह अगस्त‘ माथुर जी की राष्ट्रवादी कविता है – स्पष्ट करें।
उत्तर: ‘पन्द्रह अगस्त‘ राष्ट्रवादी कविता है क्योंकि यह स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रवासियों को स्वाधीनता बनाए रखने का आह्वान करती है। यह कविता बाहरी शत्रु के साथ-साथ आंतरिक शत्रु (जैसे शोषण और वैमनस्य) से भी लड़ने और राष्ट्र निर्माण की नई चेतना में गतिशील रहने की प्रेरणा देती है।
प्रश्न 5: ‘पन्द्रह अगस्त‘ कविता का सार लिखते हुए इसका प्रतिपाद्य स्पष्ट करें।
उत्तर: कविता का प्रतिपाद्य स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जागरूकता और निरंतर प्रयास का संदेश देना है। कवि कहते हैं कि आजादी केवल मंज़िल का छोर है, इसलिए देश के रक्षकों को आंतरिक अव्यवस्था और दुखों की विगत साँवली कोर को मिटाने के लिए सावधान रहकर नए युग की पतवार संभालनी है।
खंड (ख) सप्रसंग व्याख्या करें:
प्रश्न 6: ऊँची हुई मशाल ……… सावधान रहना।
उत्तर: प्रश्न 6 में दिए गए पद्यांश (पन्द्रह अगस्त का पद्यांश 3) की सप्रसंग व्याख्या ऊपर विस्तार से की जा चुकी है।
प्रश्न 7: इस पर भी आदमी ……… दो दुनिया रचता है।
उत्तर: प्रश्न 7 में दिए गए पद्यांश (आदमी का अनुपात का पद्यांश 2) की सप्रसंग व्याख्या ऊपर विस्तार से की जा चुकी है।