मन के हारे हार है, मन के जीते जीत (अनुच्छेद – कक्षा नौवीं)

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मन के हारे हार है, मन के जीते जीत

               दुःख-सुख सब कहूँ परत है, पौरुष तजहु न मीत। मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। अर्थात् दुःख और सुख तो सभी पर आते हैं किंतु हमें पौरुष नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि हार और जीत तो केवल मन के मानने या न मानने पर ही निर्भर करती है। जो जीवन में मुसीबतों से हार मान लेता है, उसे मुसीबतें और भी जकड़ लेती हैं और जो मुसीबतों से विकट परिस्थितियों में भी हिम्मत नहीं छोड़ता, उसके आगे तो मुसीबतें भी घुटने टेक देती हैं। अतः मन ही परम शक्ति है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने मन की अपार शक्ति को समझना चाहिए। मन में नकारात्मक सोच की अपेक्षा सदैव सकारात्मक सोच रखनी चाहिए। ज़रा सोचो, पतझड़ के समय जब वृक्ष के सारे पत्ते झड़ जाते हैं तो बसंत आने पर क्या पेड़ फिर से हरा नहीं होता ? रात के बाद क्या सुबह नहीं होती ? अतः मन की लगाम कस कर पकड़ कर उसे लक्ष्य की ओर बार-बार लगाना चाहिए और नकारात्मक विचारों से मन को पूरी तरह हटाना चाहिए। जब मन काबू में हो गया, फिर देखिए, जिंदगी कैसे सरपट भागती

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