पाठ 15: अध्यापक पूर्ण सिंह (निबंध: सच्ची वीरता) अध्यापक पूर्ण सिंह
(क) लगभग 60 शब्दों में उत्तर दें
प्रश्न 1. सच्चे वीर पुरुष का स्वभाव कैसा होता है?
उत्तर: सच्चे वीर पुरुष गंभीर, शांत और अटल होते हैं। उनके मन की गंभीरता और शांति समुद्र की तरह विशाल होती है और वे आकाश की तरह स्थिर और अचल होते हैं; वे कभी चंचल नहीं होते। सच्चा वीर सत्यव्रती, त्यागी तथा विचित्र होता है। सच्ची वीरता बनावट और दिखावे से दूर रहती है और इसकी कभी नकल नहीं हो सकती।
प्रश्न 2. ‘वीर पुरुष का दिल सबका दिल हो जाता है।‘ लेखक पूर्ण सिंह को इस उक्ति का क्या भाव है?
उत्तर: लेखक के अनुसार, जब सच्चा वीर पुरुष जन्म लेता है, तो सारा संसार उसके आगे सिर झुका देता है। वीर पुरुष का दिल सबका दिल हो जाता है। उसके ख़याल सबको ख़याल हो जाते हैं और उसका संकल्प सबका संकल्प बन जाता है। वीर का यह संकल्प बलवान होता है और वह सब उद्योग से युक्त होता है।
(ख) लगभग 150 शब्दों में उत्तर दें
प्रश्न 3. ‘सच्ची वीरता‘ निबंध का सार अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर: ‘सच्ची वीरता‘ अध्यापक पूर्ण सिंह का पहला निबंध है। इसमें लेखक ने ओजस्वी शैली में सच्ची वीरता के लक्षणों, वीर पुरुषों के गुणों, और वीरों के सहायकों का विस्तृत वर्णन किया है। लेखक बताते हैं कि सच्चा वीर पुरुष गंभीर, शांत, त्यागी और विचित्र स्वभाव का होता है। वीरता का यह गुण बनावट या दिखावे से नहीं आता, बल्कि यह देश–काल के अनुसार जब जिस रूप में जन्म लेती है, तो संसार उसके आगे सिर झुका देता है।
लेखक ने जोर दिया है कि वीरता किसी अरण्य (जंगल) में तपस्या के बाद उत्पन्न होती है, या किसी खेत–खलिहान में। सच्चा वीर बाहर की प्रशंसा, बार–बार लिखने, या नाम की ख़ातिर बढ़ने को तुच्छ समझता है। इस निबंध में ईसा मसीह, मीराबाई, और गुरु नानक देव के उदाहरण दिए गए हैं, जिन्होंने मुसीबतों को मखौल समझा। लेखक का अंतिम संदेश है कि सच्ची वीरता बाहर की चीज़ नहीं है, बल्कि यह आंतरिक केंद्र की स्थिरता और प्रेम तथा पवित्रता के गुण में प्रवेश करने से प्राप्त होती है।
प्रश्न 4. जापान के ओशियो की वीरता का उदाहरण प्रस्तुत निबंध के आधार पर लिखो।
उत्तर: जापान का ओशियो एक वृद्ध, ज्ञानी और अनुभवी पुरुष था, जो शांत स्वभाव का था और हमेशा सत्गुण (सत्य) के समुद्र में डूबा रहता था। जब एक बार दुर्भिक्ष (अकाल) पड़ा और लोग दुखी हुए, तो ओशियो ने गरीब आदमियों की सहायता के लिए अपने कपड़े और किताबें तक बेच दिए।
ओशियो ने लोगों को हाथ में बाँस लेकर तैयार होने और बग़ावत का झंडा खड़ा करने को कहा। जब वह पकड़ा गया और उसे बादशाह के क़िले पर हमला करने के लिए ले जाया गया, तो उसने वज़ीरों से कहा कि अनाज से भरा राज–भंडार ग़रीबों की मदद के लिए क्यों नहीं खोल दिया जाता। इस घटना से जापान के राजा का डर भी दैवी शक्ति जैसा हो गया। ओशियो की वीरता तलवार या बल पर नहीं टिकी थी, बल्कि प्रेम, हृदय की सच्चाई और दृढ़ता पर आधारित थी।
प्रश्न 5. ‘सच्चे वीर पुरुष मुसीबत को मखौल समझते हैं‘ ईसा मसीह, मीराबाई और गुरु नानक देव के जीवन से उदाहरण देते हुए प्रस्तुत निबंध के आधार पर स्पष्ट करें।
उत्तर: सच्चे वीर पुरुष मुसीबत को अपने रास्ते से हटाने के लिए नहीं लड़ते, बल्कि वे अपने अपमान और कष्ट को अपनी ताकत से नकारकर उन्हें मखौल समझते हैं।
ईसा मसीह: जब उन्हें सूली पर चढ़ाया गया, तो वह उस भारी सलीब को भी अपने ऊपर रखकर उस पर मरकर विजयी हो जाते हैं।
मीराबाई: राणा ने जब उन्हें विष (ज़हर) का प्याला भेजा, तो मीराबाई ने उसे प्रेम का प्याला समझकर अमृत के समान पी लिया, और ज़हर उनके लिए प्रेम का आहार बन गया।
गुरु नानक देव: बाबर के सिपाहियों ने जब गुरु नानक को बेगार में पकड़ लिया और उनके सिर पर बोझ रखा, तो चारों ओर दुःख के माहौल में भी उन्होंने अपने साथी मर्दाना से कहा: “सारंगी बजाओ, हम गाते हैं“।
ये महान पुरुष अपनी मृत्यु और कष्टों को भी एक तुच्छ बात समझते हैं, जिससे सिद्ध होता है कि वे मुसीबतों को केवल एक खेल या मखौल मानते हैं।
(ग) सप्रसंग व्याख्या करें
प्रश्न 6. “सच है, सच्चे वीरों की नींद आसानी से नहीं खुलती। वे सत्गुण के क्षीर समुद्र में ऐसे डूबे रहते हैं कि उनको दुनिया की खबर ही नहीं रहती।“
प्रसंग: यह गद्यांश ‘हिंदी पुस्तक 12′ से संकलित ‘सच्ची वीरता‘ नामक निबंध से लिया गया है। इस निबंध के लेखक अध्यापक पूर्ण सिंह हैं। इन पंक्तियों में लेखक सच्चे वीर पुरुषों की आंतरिक स्थिरता, शांति और परोपकार की भावना का वर्णन कर रहे हैं।
व्याख्या: लेखक कहते हैं कि सच्चे वीर पुरुष इतने गंभीर और प्रशांत होते हैं कि वे बाहरी दुनिया के शोर–शराबे से अप्रभावित रहते हैं। वे हमेशा सत्गुण (सत्य और धार्मिक प्रवृत्तियों) रूपी क्षीर सागर (दूध के समुद्र) में लीन रहते हैं। वे संसार की क्षणिक और दिखावटी चीज़ों से दूर होते हैं, इसलिए उन्हें दुनिया की ख़बरों की सुध नहीं रहती। वे सच्चे परोपकारी होते हैं और संसार के बड़े–बड़े तख़्तों (सिंहासनों) को भी अपनी आँखों की पलकों से तुच्छ समझते हैं।
प्रश्न 7. “कायर पुरुष कहते हैं – ‘आगे चलो।‘ वीर कहते हैं – ‘पीछे हटे चलो।‘ कायर कहते हैं – ‘उठाओ तलवार।‘ वीर कहते हैं – ‘सिर आगे करो।‘”
प्रसंग: यह गद्यांश ‘हिंदी पुस्तक 12′ से संकलित ‘सच्ची वीरता‘ नामक निबंध से लिया गया है। इस निबंध के लेखक अध्यापक पूर्ण सिंह हैं। यहाँ लेखक ने सच्चे वीर पुरुष और कायर पुरुष के चरित्र तथा क्रियाकलापों के बीच का मूलभूत विरोधाभास स्पष्ट किया है।
व्याख्या: लेखक ने विपरीत शब्दों का प्रयोग करते हुए सच्चे वीरों और कायरों के दृष्टिकोणों का अंतर बताया है। कायर पुरुष डरपोक होते हैं, इसलिए वे स्वयं छिपकर दूसरों को ‘आगे चलो‘ कहकर धकेलते हैं, जबकि सच्चा वीर पुरुष दूसरों की रक्षा के लिए उन्हें ‘पीछे हटे चलो‘ कहता है। कायर हमेशा बाहरी औजारों पर निर्भर रहता है और कहता है ‘उठाओ तलवार‘। लेकिन सच्चा वीर व्यक्ति प्रेम और सत्य के लिए खुद बलिदान देने को तैयार रहता है और कहता है ‘सिर आगे करो‘। वीर पुरुष जीवन की शक्ति को प्रकृति पर फ़िज़ूल खोने की बजाय उसे बचाना चाहते हैं।
प्रश्न 8. “मगर वाह रे प्रेम! मस्त हाथी और शेर ने देवी के चरणों की धूल को अपने मस्तक पे मला और अपना रास्ता लिया। इसके वास्ते वीर पुरुष आगे नहीं, पीछे जाते हैं, भीतर ध्यान करते हैं, मारते नहीं, मरते हैं।“
प्रसंग: यह गद्यांश ‘हिंदी पुस्तक 12′ से संकलित ‘सच्ची वीरता‘ नामक निबंध से लिया गया है। इस निबंध के लेखक अध्यापक पूर्ण सिंह हैं। यह अंश मनसूर के प्रसंग को बताते हुए प्रेम और त्याग की उस महान शक्ति का वर्णन करता है, जिस पर सच्चे वीर का जीवन आधारित होता है।
व्याख्या: लेखक प्रेम की शक्ति की महिमा का वर्णन करते हैं, जिसके सामने हिंसक और मदमस्त हाथी तथा शेर भी शांत हो गए और उन्होंने देवी के चरणों की धूल को आदरपूर्वक अपने मस्तक पर मल लिया। लेखक बताते हैं कि इसी प्रेम के लिए सच्चे वीर पुरुष युद्ध में आगे नहीं जाते, बल्कि पीछे हट जाते हैं। वे बाहरी मार–काट की बजाय भीतर ध्यान करते हैं (यानी आंतरिक सत्य पर केंद्रित रहते हैं)। वीर पुरुष किसी पर हमला करने की बजाय, अपने आदर्श और सत्य के लिए मरते हैं।
प्रश्न 9. “पेड़ तो ज़मीन से इसे ग्रहण करने में लगा रहता है, उसे ख्याल ही नहीं होता कि मुझमें कितने फल या फूल लगेंगे और कब लगेंगे।“
प्रसंग: यह गद्यांश ‘हिंदी पुस्तक 12′ से संकलित ‘सच्ची वीरता‘ नामक निबंध से लिया गया है। इस निबंध के लेखक अध्यापक पूर्ण सिंह हैं। इस पंक्ति में, लेखक एक प्राकृतिक उदाहरण (पेड़) के माध्यम से समझाते हैं कि वीरता का विकास अनायास और स्वाभाविक ढंग से होता है।
व्याख्या: लेखक समझाते हैं कि वीरता किसी बाहरी प्रयत्न से पैदा नहीं होती, बल्कि यह आंतरिक शक्ति से उत्पन्न होती है। जिस प्रकार एक पेड़ लगातार ज़मीन से जीवन रस (जल, पोषक तत्व) ग्रहण करने में लगा रहता है, उसे इस बात की चिंता नहीं होती कि भविष्य में उसमें कितने फल या फूल लगेंगे। पेड़ का सारा ध्यान केवल अपने–आपको सत्य में स्थिर रखने और अंदर–ही–अंदर बलवान बनने में होता है। इसी प्रकार, वीर पुरुष भी अपने आंतरिक विकास और आत्मबल को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, न कि बाहरी परिणामों या लोगों से प्रशंसा प्राप्त करने पर।