6. सच्ची मित्रता एवं याचना (जयशंकर प्रसाद)
📖 संक्षिप्त परिचय
यह पाठ महान छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित है । इसमें प्रसाद जी की दो रचनाएँ ‘सच्ची मित्रता‘ और ‘याचना‘ संकलित हैं । ‘सच्ची मित्रता‘ कविता ‘प्रेम पथिक‘ से ली गई है, जिसमें कवि ने बताया है कि आज के युग में सच्चे मित्र की प्राप्ति अत्यंत दुर्लभ है । आजकल मित्रता के नाम पर केवल स्वार्थ की पूर्ति और शिष्टाचार ही निभाया जाता है। दूसरी कविता ‘याचना‘ में कवि का आशावादी दृष्टिकोण दिखाई देता है और वे हमें जीवन में कभी भी निराश न होने की प्रेरणा देते हैं । इसमें कवि ने सुख–दुःख की प्रत्येक परिस्थिति में ईश्वर के प्रति निष्ठावान रहने का महत्व बताया है।
📝 सप्रसंग व्याख्या
1. सच्ची मित्रता
(I) कहाँ मित्रता, कैसी बातें? अरे कल्पना है सब ये
सच्चा मित्र कहाँ मिलता है? दुखी हृदय की छाया–सा।
जिसे मित्रता समझ रहे हो, क्या वह शिष्टाचार नहीं?
मुँह देखे की मीठी बातें, चिकनी–चुपड़ी ही सुन लो।
प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक 12′ में संकलित कविता ‘सच्ची मित्रता‘ से लिया गया है। इसके रचयिता जयशंकर प्रसाद हैं। इन पंक्तियों में कवि ने वर्तमान समय में सच्ची मित्रता के अभाव और शिष्टाचार को ही मित्रता समझने की प्रवृत्ति पर प्रकाश डाला है।
व्याख्या: कवि कहते हैं कि आजकल सच्ची मित्रता की बात करना व्यर्थ है; ये सब कोरी कल्पना मात्र हैं । एक सच्चा मित्र, जो दुखी हृदय की छाया के समान सहारा दे, वह मिलना बहुत ही दुर्लभ है । जिसे लोग मित्रता मान रहे हैं, वह क्या वास्तव में औपचारिकता या शिष्टाचार नहीं है? कवि का कहना है कि लोग एक–दूसरे से केवल मुँह–देखी मीठी और चिकनी–चुपड़ी बातें ही करते हैं, और इसी को मित्रता मान लिया जाता है ।
(II) जिसे समझते हो तुम अपना मित्र भूल कर वही अभी
जब तुम हट जाते हो, तुमको पूरा मूर्ख बनाता है।
क्षण भर में ही बने मित्रवर अंतरंग या सखा समान
प्रिय हो, ‘प्रियवर‘ हो सब तुम हो, काम पड़े पर परिचित हो।
प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक 12′ में संकलित कविता ‘सच्ची मित्रता‘ से लिया गया है। इसके रचयिता जयशंकर प्रसाद हैं। इन पंक्तियों में कवि ने स्वार्थी और दिखावटी मित्रता का वास्तविक चित्रण किया है।
व्याख्या: कवि कहते हैं कि जिस व्यक्ति को तुम भूलकर भी अपना मित्र समझते हो, वही तुम्हारे पीठ पीछे तुम्हें पूरा मूर्ख बनाता है । आज के समय में लोग क्षण भर में ही घनिष्ठ (अंतरंग) मित्र या सखा बन जाते हैं । वे तुम्हें ‘प्रिय‘ या ‘प्रियवर‘ कहकर पुकारते हैं, लेकिन जब कोई काम पड़ता है, तो वही मित्र अपरिचित बन जाते हैं और तुम्हें पहचानते तक नहीं हैं ।
(III) कहीं तुम्हारा ‘स्वार्थ‘ लगा है, कहीं ‘लोभ‘ है मित्र बना
कहीं ‘प्रतिष्ठा‘ कहीं ‘रूप‘ है– मित्ररूप में रंगा हुआ।
हृदय खोलकर मिलने वाले बड़े भाग्य से मिलते है।
मिल जाता है जिस प्राणी को सत्य प्रेममय मित्र कहीं।
प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक 12′ में संकलित कविता ‘सच्ची मित्रता‘ से लिया गया है। इसके रचयिता जयशंकर प्रसाद हैं। इन पंक्तियों में कवि ने स्वार्थी मित्रता के विभिन्न रूपों और सच्चे मित्र के महत्व पर बल दिया है।
व्याख्या: कवि बताते हैं कि आजकल मित्रता के पीछे कहीं–न–कहीं कोई स्वार्थ जुड़ा हुआ है। कहीं पर लोभ मित्रता का कारण बना हुआ है, तो कहीं पर प्रतिष्ठा (मान–सम्मान) या रूप (सौन्दर्य) ही मित्र के वेश में रंगकर सामने आता है । जो लोग दिल से (हृदय खोलकर) मिलते हैं, ऐसे सच्चे मित्र मिलना बड़े सौभाग्य की बात है । जिस व्यक्ति को कहीं पर भी सच्चा और प्रेम से भरा मित्र मिल जाता है ।
(IV) निराधार भवसिन्धु बीच वह कर्णधार को पाता है
प्रेम–नाव खेकर जो उसको सचमुच पार लगाता है।
प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक 12′ में संकलित कविता ‘सच्ची मित्रता‘ से लिया गया है। इसके रचयिता जयशंकर प्रसाद हैं। इन पंक्तियों में कवि ने सच्चे मित्र को जीवन–नाव का मल्लाह (नाविक) बताकर उसकी उपयोगिता स्पष्ट की है।
व्याख्या: जिस प्राणी को सच्चा, प्रेममय मित्र मिल जाता है , वह मानो इस निराधार संसार रूपी सागर (भव सिन्धु) के बीच में पार लगाने वाले नाविक (कर्णधार) को पा लेता है। यह सच्चा मित्र प्रेम रूपी नाव को चलाकर उसे जीवन–सागर से सचमुच पार लगा देता है। अर्थात्, सच्चा मित्र जीवन की मुश्किलों में मार्गदर्शक बनकर व्यक्ति की सहायता करता है।
2. याचना
(I) जब प्रलय का हो समय, ज्वालामुखी निज मुख खोल दे,
सागर उमड़ता आ रहा हो, शक्ति–साहस बोल दे,
ग्रह गण सभी हों केन्द्रच्युत, लड़कर परस्पर भग्न हों,
इस समय भी हम हे प्रभो ! तब पद्म–पद में लग्न हों।
प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक 12′ में संकलित कविता ‘याचना‘ से लिया गया है। इसके रचयिता जयशंकर प्रसाद हैं। इन पंक्तियों में कवि प्रलयकाल जैसी भयंकर परिस्थितियों में भी ईश्वर के चरणों के प्रति निष्ठा बनाए रखने का वरदान माँग रहे हैं।
व्याख्या: कवि ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हे प्रभु! जब प्रलय का समय हो, ज्वालामुखी अपना मुँह खोल दें, सागर उमड़ता हुआ आ रहा हो और हमारी शक्ति तथा साहस भी जवाब दे जाए, नक्षत्र (ग्रह गण) अपने स्थान से हटकर (केन्द्रच्युत) एक–दूसरे से लड़कर टूट–फूट (भग्न) गए हों , ऐसे भयंकर समय में भी हम आपके चरण–कमलों (पद्म–पद) में लीन (लग्न) रहें । अर्थात्, कवि हर आपदा में भी ईश्वर पर अटूट विश्वास बनाए रखना चाहते हैं।
(II) जब शैल के सब श्रृंग विद्युद्–वृन्द के आघात से
हों गिर रहे भीषण मचाते विश्व में व्याघात से,
जब घिर रहे हों प्रलय घन अवकाश–गत आकाश में
तब भी प्रभो ! यह मन खिंचे तव प्रेम–धारा–पाश में।
प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक 12′ में संकलित कविता ‘याचना‘ से लिया गया है। इसके रचयिता जयशंकर प्रसाद हैं। इन पंक्तियों में कवि विनाशकारी प्राकृतिक घटनाओं के समय भी ईश्वर के प्रेम के बंधन में बँधे रहने की कामना कर रहे हैं।
व्याख्या: कवि कहते हैं कि जब पर्वत की सभी चोटियाँ (शैल के सब श्रृंग) बिजली के समूह (विद्युद्–वृन्द) के आघात से टूटकर गिर रही हों, और विश्व में भयंकर विनाश (व्याघात) मचा रही हों, जब प्रलयकारी बादल खाली (अवकाश) पड़े आकाश में घिर रहे हों, तब भी हे प्रभु! मेरा यह मन आपके प्रेम की धारा के बंधन (पाश) में खींचा चला आए । कवि हर संकट में ईश्वर के प्रेम को ही अपना आधार बनाना चाहते हैं।
(III) जब छोड़कर प्रेमी तथा सन्मित्र सब संसार में,
इस घाव पर छिड़कें नमक, हो दुःख खड़ा आकार में,
करुणानिधे ! हों दुःख सागर में कि हम आनन्द में,
मन–मधुप हो विश्वस्त–प्रमुदित तब चरण–अरविन्द में।
प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक 12′ में संकलित कविता ‘याचना‘ से लिया गया है। इसके रचयिता जयशंकर प्रसाद हैं। इन पंक्तियों में कवि ने सामाजिक कष्टों और मानसिक पीड़ा के समय भी ईश्वर के प्रति प्रसन्न और विश्वस्त रहने की प्रार्थना की है।
व्याख्या: कवि प्रार्थना करते हैं कि जब सारे प्रेमी और अच्छे मित्र (सन्मित्र) इस संसार में हमें छोड़ दें , और जब दुःख साक्षात् आकार लेकर खड़ा हो जाए और इस पीड़ा पर लोग नमक छिड़कें (दुःख बढ़ाएँ), हे करुणा के भण्डार (करुणानिधे)! चाहे हम दुःख के सागर में हों या आनंद में हों , हमारा मन रूपी भँवरा (मन–मधुप) आपके कमल रूपी चरणों (चरण–अरविन्द) में ही विश्वस्त (आश्रित) और प्रसन्न (प्रमुदित) रहे ।
(IV) हम हों, सुमन की सेज पर या कण्टकों की बाड़ में,
पर प्राणधन ! तुम छिपे रहना इस हृदय की आड़ में,
हम हों कहीं इस लोक में, उस लोक में, भू–लोक में।
तब प्रेम–पथ में ही चलें, हे नाथ! तब आलोक में।
प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी पुस्तक 12′ में संकलित कविता ‘याचना‘ से लिया गया है। इसके रचयिता जयशंकर प्रसाद हैं। इन पंक्तियों में कवि ने सुख–दुःख की हर स्थिति में और तीनों लोकों में भी ईश्वर के प्रेम और प्रकाश के मार्ग पर चलने का वरदान माँगा है।
व्याख्या: कवि कहते हैं कि हम चाहे फूलों की सेज (सुमन की सेज) पर हों या काँटों की बाड़ में हों (अर्थात् चाहे सुख में हों या दुःख में हों), हे स्वामी (प्राणधन)! आप इस हृदय के ओट में छिपे रहना । हम इस संसार (इस लोक), स्वर्ग (उस लोक) या पृथ्वी (भू–लोक) में कहीं भी हों, हे नाथ! हम हमेशा आपके प्रेम के मार्ग पर ही चलें, और आपके प्रकाश (तब आलोक) में ही आगे बढ़ें ।
❓ अभ्यास के प्रश्नों के उत्तर
(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 40 शब्दों में लिखो: –
प्रश्न 1. मित्रता और शिष्टाचार में प्रसाद जी ने क्या अन्तर बतलाया है?
उत्तर: मित्रता और शिष्टाचार में मुख्य अंतर यह है कि शिष्टाचार केवल मुँह–देखी मीठी बातों और औपचारिकता तक सीमित होता है। इसमें स्वार्थ और दिखावा हो सकता है । इसके विपरीत, सच्ची मित्रता में हृदय से खुलकर मिलना और सत्य प्रेम होता है । सच्चा मित्र दुख में छाया देता है और प्रेम की नाव खेकर जीवन–सागर से पार लगाता है।
प्रश्न 2. ‘सच्ची मित्रता‘ क्या है? प्रस्तुत कविता के माध्यम से व्यक्त करें।
उत्तर: प्रस्तुत कविता के अनुसार, सच्ची मित्रता वह है जो सत्य प्रेम पर आधारित हो । सच्चा मित्र दुखी हृदय की छाया के समान सहारा देने वाला होता है । वह स्वार्थ से मुक्त होता है और जीवन के संसार रूपी सागर (भव सिन्धु) में पार लगाने वाले नाविक (कर्णधार) की तरह होता है, जो प्रेम की नाव से व्यक्ति को पार लगाता है। ऐसे मित्र बड़े सौभाग्य से मिलते हैं ।
प्रश्न 3. ‘याचना‘ कविता में कवि ने प्रभु से क्या वरदान माँगा है?
उत्तर: ‘याचना‘ कविता में कवि ने प्रभु से यह वरदान माँगा है कि वह प्रलय जैसी भयंकर से भयंकर प्राकृतिक आपदाओं में भी उनके चरण–कमलों (पद्म–पद) में लीन (लग्न) रहें । कवि कामना करते हैं कि जब दुनिया साथ छोड़ दे और दुःख चारों ओर छा जाए, तब भी उनका मन उनके प्रेम की धारा के बंधन में खिंचा रहे और उनके चरणों में विश्वस्त तथा प्रसन्न (प्रमुदित) बना रहे ।
प्रश्न 4. प्राकृतिक आपदाओं के समय हमारी मनोदशा कैसी होनी चाहिए?
उत्तर: ‘याचना’ कविता के अनुसार, प्राकृतिक आपदाओं (जैसे ज्वालामुखी, उमड़ता सागर, शैल श्रृंग का गिरना) के समय हमारी मनोदशा साहस और ईश्वर के प्रति निष्ठा से भरी होनी चाहिए । कवि ने कामना की है कि ऐसे समय में भी हमारा मन प्रभु के चरण–कमलों में लीन रहे और उनके प्रेम के बंधन (प्रेम–धारा–पाश) में खिंचा रहे । हमें निराश नहीं होना चाहिए।
प्रश्न 5. ‘याचना‘ कविता में जयशंकर प्रसाद ने ईश्वर को किन–किन विशेषणों से अलंकृत किया है?
उत्तर: ‘याचना’ कविता में जयशंकर प्रसाद ने ईश्वर को निम्नलिखित विशेषणों से अलंकृत किया है:
प्रभो: (हे प्रभु/ईश्वर)
करुणानिधे: (हे करुणा के भण्डार)
प्राणधन: (स्वामी/जीवन के आधार)
नाथ: (स्वामी)
इन विशेषणों के माध्यम से कवि ने ईश्वर के प्रति अपनी श्रद्धा, विश्वास, और प्रेम को व्यक्त किया है।