पाठ 7. दो लड़के, सुख-दुःख (सुमित्रानंदन पंत) 📝

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7. दो लड़के, सुखदुःख (सुमित्रानंदन पंत) 📝

यह पाठप्रकृतिपुत्रऔरसुकुमार कल्पना के कविकहे जाने वाले श्री सुमित्रानंदन पंत जी के जीवन परिचय और उनकी दो कविताओंदो लड़केऔरसुखदुःखका संकलन है । ‘दो लड़केकविता उनकी प्रसिद्ध रचनायुगवाणीसे ली गई है, जिसमें कवि ने एक ओर दो लड़कों की स्वाभाविक चंचलता और फुर्तीली छवि को उभारा है, वहीं दूसरी ओर समाज के अभावग्रस्त वर्ग की ओर संकेत करते हुए मानव कल्याण और मानवता के साम्राज्य की स्थापना की कामना की हैदूसरी कवितासुखदुःखमें पंत जी का जीवन दर्शन झलकता है, जहाँ वे दुःख और सुख के मधुर मिलन को ही सृष्टि का आधार मानते हैं

पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

1. ‘दो लड़केकविता की सप्रसंग व्याख्या
पद्यांश 1 मेरे आँगन में, टीले पर है मेरा घर,
दो छोटेसे लड़के जाते हैं अक्सर,
नंगेतन, गदबदे, साँवले, सहज छबीले,
मिट्टी के मटमैले पुतले पर फुर्तीले !
प्रसंग: यह प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तकहिंदी पुस्तक 12′ में संकलित कवि सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित कवितादो लड़केसे लिया गया है इस अंश में कवि अपने घर के पास आने वाले दो छोटे लड़कों के रूप और स्वभाव का वर्णन कर रहे हैं

व्याख्या: कवि कहते हैं कि उनका घर एक टीले पर उनके आँगन में बना हुआ हैवहाँ दो छोटे लड़के अक्सर जाते हैंउनका शरीर नंगा है, वे माँसल (गदबदे), साँवले और सहज रूप से सुंदर (छबीले) हैंवे ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे मिट्टी के मटमैले पुतले हों, पर वे स्वभाव से बहुत फुर्तीले हैं

पद्यांश 2 जल्दी से, टीले के नीचे, उधर उतर कर
वे चुन ले जाते कूड़े से निधियाँ सुन्दर
सिगरेट के खाली डिब्बे, पन्नी चमकीली,
फीतों के टुकड़े, तस्वीरें नीली पीली
प्रसंग: यह प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तकहिंदी पुस्तक 12′ में संकलित कवि सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित कवितादो लड़केसे लिया गया है इस अंश में कवि उन लड़कों द्वारा कूड़े में खोजी जाने वाली चीज़ों का वर्णन करते हैं, जो उनके लिएसुंदर निधियोंके समान हैं

व्याख्या: कवि बताते हैं कि वे लड़के बड़ी जल्दी से टीले के नीचे उतर जाते हैंवहाँ वे कूड़े में से कुछ चीज़ें चुन कर ले जाते हैं, जिन्हें वे सुंदर निधियाँ (खज़ाना) मानते हैंयेनिधियाँवास्तव में सिगरेट के खाली डिब्बे, चमकीली पन्नी, फीतों के टुकड़े, और नीलीपीली तस्वीरें होती हैं

पद्यांश 3 मासिकपत्रों के कवरों की: और, बन्दर से
किलकारी भरते हैं, खुश होहो अन्दर से
दौड़ पार आँगन के फिर हो जाते ओझल
वे नाटे छह सात साल के लड़के माँसल
प्रसंग: यह प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तकहिंदी पुस्तक 12′ में संकलित कवि सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित कवितादो लड़केसे लिया गया है इस अंश में लड़कों की फुर्तीली हरकतों और उम्र का वर्णन किया गया है

व्याख्या: वे लड़के मासिकपत्रों के कवरों को देखकर और अपनीनिधियाँपाकर, बंदरों की तरह किलकारी भरते हैं और अंदर से बहुत खुश होते हैंफिर वे दोनों दौड़कर आँगन को पार कर जाते हैं और ओझल (गायब) हो जाते हैंकवि बताते हैं कि वे छहसात साल के, छोटे कद (नाटे) और माँसल शरीर वाले बच्चे हैं

पद्यांश 4 सुन्दर लगती नग्न देह, मोहती नयनमन,
मानव के नाते उर में भरता अपनापन
मानव के बालक हैं ये पासी के बच्चे,
रोमरोम मानव, साँचे में ढाले सच्चे
प्रसंग: यह प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तकहिंदी पुस्तक 12′ में संकलित कवि सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित कवितादो लड़केसे लिया गया है इस अंश में कवि उन बच्चों के सौंदर्य और उनके प्रति अपने मानवीय लगाव को व्यक्त करते हैं

व्याख्या: कवि कहते हैं कि उन लड़कों का नग्न (वस्त्रहीन) शरीर उन्हें सुंदर लगता है और उनके नेत्रों तथा मन को मोह लेता हैमानव होने के नाते उनके हृदय में इन बच्चों के लिए अपनापन भर जाता हैवे स्पष्ट करते हैं कि ये बच्चे यद्यपि पासी (एक जाति) के हैं, पर हैं तो मानव के बालकउनका रोमरोम मानव है और वे जैसे सच्चे साँचे में ढाले गए हों

पद्यांश 5 अस्थिमाँस के इन जीवों का ही यह जग घर,
आत्मा का अधिवास यह, वह सूक्ष्म अनश्वर !
न्योछावर है आत्मा नश्वर रक्तमाँस पर,
जग का अधिकारी है वह, जो है दुर्बलतर
प्रसंग: यह प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तकहिंदी पुस्तक 12′ में संकलित कवि सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित कवितादो लड़केसे लिया गया है इस अंश में कवि शारीरिक अस्तित्व और मानव जगत के अधिकार के विषय में अपना प्रगतिवादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं

व्याख्या: कवि कहते हैं कि यह संसार (जग) हड्डी और माँस (अस्थिमाँस) से बने इन जीवों का ही घर हैयह आत्मा का निवास स्थान (अधिवास) नहीं है, क्योंकि आत्मा तो सूक्ष्म और नाश रहित (अनश्वर) हैवे मानते हैं कि नश्वर (नाशवान) रक्तमाँस के शरीर पर ही आत्मा न्योछावर हैइसलिए, इस संसार पर अधिकार उसका है जो सबसे कमज़ोर (दुर्बलतर) हैअर्थात इन शोषित, अभावग्रस्त बच्चों का

पद्यांश 6 वह्नि, बाढ़, उल्का, झंझा की भीषण भू पर
कैसे रह सकता है कोमल मनुज कलेवर !
निष्ठुर है जड़ प्रकृति, सहज भंगुर जीवित जन,
मानव को चाहिए यहाँ मनुजोचित साधन !
प्रसंग: यह प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तकहिंदी पुस्तक 12′ में संकलित कवि सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित कवितादो लड़केसे लिया गया है इस अंश में कवि कठोर प्रकृति और मानवीय आवश्यकताओं पर ज़ोर देते हैं

व्याख्या: कवि प्रश्न करते हैं कि आग (वह्नि), बाढ़, टूटते तारे (उल्का) और आँधी (झंझा) जैसी भयानक और कठोर धरती (भू) पर मनुष्य का कोमल शरीर (कलेवर) कैसे सुरक्षित रह सकता है? कवि कहते हैं कि जड़ (निर्जीव) प्रकृति निष्ठुर है और जीवित प्राणी सहज ही नाशवान (भंगुर) हैंइसलिए, मानव को इस संसार में मनुष्य के योग्य (मनुजोचित) साधन मिलने चाहिए, ताकि वह सुरक्षित और सम्मान से जी सके

पद्यांश 7 क्यों एक हों मानव मानव सभी परस्पर
मानवता निर्माण करें जग में लोकोत्तर ?
जीवन का प्रासाद उठे भू पर गौरवमय,
मानव का साम्राज्य बने, मानव हित निश्चय
प्रसंग: यह प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तकहिंदी पुस्तक 12′ में संकलित कवि सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित कवितादो लड़केसे लिया गया है इस अंश में कवि मानवता की एकता और मानव कल्याण पर आधारित एक आदर्श समाज की स्थापना की कामना करते हैं

व्याख्या: कवि पूछते हैं कि सभी मनुष्य एकदूसरे से परस्पर एक क्यों हों? क्यों वे इस संसार में अद्भुत (लोकोत्तर) मानवता का निर्माण करें? कवि चाहते हैं कि इस पृथ्वी पर जीवन का महल (प्रासाद) गौरवमय तरीके से स्थापित होऔर निश्चित रूप से मानव के हित के लिए ही मानव का साम्राज्य बने, जहाँ शोषण हो, बल्कि सबका कल्याण हो

पद्यांश 8 जीवन की क्षण धूलि रह सके जहाँ सुरक्षित,
रक्त माँस की इच्छाएँ जन की हों पूरित
मनुज प्रेम से जहाँ रह सकें मानव ईश्वर !
और कौन सा स्वर्ग चाहिए तुझे धरा पर?
प्रसंग: यह प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तकहिंदी पुस्तक 12′ में संकलित कवि सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित कवितादो लड़केसे लिया गया है इस अंश में कवि एक ऐसे आदर्श समाज की कल्पना करते हैं जो स्वर्ग से कम नहीं है

व्याख्या: कवि एक ऐसे संसार की कल्पना करते हैं जहाँ जीवन की क्षणिक धूल भी सुरक्षित रह सकेमनुष्यों के रक्तमाँस (शारीरिक) की इच्छाएँ पूरी होंजहाँ मनुष्य ही प्रेम के कारण मानवईश्वर बनकर रह सकेंकवि कहते हैं कि यदि यह सब पृथ्वी पर संभव हो जाए, तो फिर किसी दूसरे स्वर्ग की क्या आवश्यकता है?

2. ‘सुखदुःखकविता की सप्रसंग व्याख्या
पद्यांश 1 मैं नहीं चाहता चिरसुख,
मैं नहीं चाहता चिरदुःख,
सुखदुःख की खेलमिचौनी,
खोले जीवन अपना मुख
प्रसंग: यह प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तकहिंदी पुस्तक 12′ में संकलित कवि सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित कवितासुखदुःखसे लिया गया है इस अंश में कवि सुखदुःख के समन्वय की इच्छा व्यक्त करते हुए अपना जीवन दर्शन प्रस्तुत करते हैं

व्याख्या: कवि कहते हैं कि वे लगातार (चिर) सुख या लगातार (चिर) दुःख नहीं चाहते हैंवे चाहते हैं कि सुख और दुःख की आँखमिचौली चलती रहे , जिसके माध्यम से जीवन अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट कर सके

पद्यांश 2 सुखदुःख के मधुर मिलन से,
यह जीवन हो परिपूरन :
फिर घन में ओझल हो शशि,
फिर शशि से ओझल हो घन
प्रसंग: यह प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तकहिंदी पुस्तक 12′ में संकलित कवि सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित कवितासुखदुःखसे लिया गया है इस अंश में कवि सुख और दुःख के मेल को जीवन की पूर्णता का आधार बताते हैं और इसके लिए बादल और चंद्रमा का उदाहरण देते हैं

व्याख्या: कवि की इच्छा है कि सुख और दुःख के मधुर मिलन से यह जीवन पूर्ण (परिपूरन) हो जाएवे उदाहरण देते हैं कि जिस प्रकार बादलों (घन) में चंद्रमा (शशि) छिप (ओझल) जाता है, और फिर चंद्रमा से बादल ओझल हो जाते हैं, ठीक उसी प्रकार सुख और दुःख का आनाजाना लगा रहना चाहिए

पद्यांश 3 जग पीड़ित है अतिदुःख से,
जग पीड़ित रे अतिसुख से;
मानवजग में बंट जावें,
दुःखसुख से , सुख दुःख से
अविरत दुःख है उत्पीड़न
अविरत सुख है उत्पीड़न
दुःखसुख की निशादिवा में
सोताजागता जगजीवन
प्रसंग: यह प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तकहिंदी पुस्तक 12′ में संकलित कवि सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित कवितासुखदुःखसे लिया गया है इस अंश में कवि अति से होने वाली पीड़ा को व्यक्त करते हुए सुखदुःख के संतुलन पर ज़ोर देते हैं

व्याख्या: कवि कहते हैं कि यह संसार (जग) अत्यधिक दुःख से भी पीड़ित है और अत्यधिक सुख से भी पीड़ित हैदुःख की अधिकता जीवन को तोड़ देती है, और अतिसुख भी संसार की पीड़ा में वृद्धि करता हैकवि चाहते हैं कि मानवसंसार में दुःख भी सुख से और सुख भी दुःख से बँट जाए, ताकि संतुलन बना रहेकवि का मानना है कि लगातार (अविरत) दुःख भी पीड़ा देने वाला (उत्पीड़न) है और लगातार सुख भी पीड़ा देने वाला हैसुख और दुःख की रात (निशा) और दिन (दिवा) में ही संसार का जीवन सोता और जागता रहता है, अर्थात् गतिशील रहता है

पद्यांश 4 यह साँझउषा का आँगन,
आलिंगन विरहमिलन का :
चिर हासअश्रुमय आनन,
रे इस मानवजीवन का
प्रसंग: यह प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तकहिंदी पुस्तक 12′ में संकलित कवि सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित कवितासुखदुःखसे लिया गया है इस अंश में कवि मानव जीवन को विरोधी भावों के मिलन के रूप में चित्रित करते हैं

व्याख्या: कवि कहते हैं कि मानव जीवन शाम (साँझ) और सुबह (उषा) का आँगन हैयह विरह (जुदाई) और मिलन (मिलाप) का आलिंगन है, जैसे साँझ और प्रभात का मेलयह मानवजीवन का चेहरा (आनन) सदैव (चिर) हँसी (हास) और आँसुओं (अश्रु) से भरा हुआ हैजिस प्रकार विरहमिलन, साँझ और प्रभात का मेल है, उसी प्रकार आँसू और मुस्कान तथा दुःख और सुख का संगम ही यह सृष्टि है

अभ्यास के प्रश्नों के उत्तर
() लगभग 40 शब्दों में उत्तर दो:
प्रश्न 1: ‘दो लड़केकविता के प्रतिपाद्य को अपने शब्दों में लिखो
उत्तर: ‘दो लड़केकविता का प्रतिपाद्य मानव कल्याण और सामाजिक समानता की स्थापना है 59कवि ने अभावग्रस्त बच्चों की फुर्तीली छवि के माध्यम से शोषण रहित और मानवोचित साधनों से पूर्ण एक ऐसे मानवतावादी समाज की कल्पना की है, जहाँ सभी मनुष्य एक हों और जीवन गौरवमय हो

प्रश्न 2: ‘दो लड़केकविता का सार अपने शब्दों में लिखो
उत्तर: कवि ने अपने घर के पास कूड़े में से सिगरेट के खाली डिब्बे आदिनिधियाँचुनने वाले दो नंगे, माँसल और फुर्तीले अभावग्रस्त बच्चों का वर्णन किया हैइन बच्चों को देखकर कवि के मन में मानव मात्र के प्रति अपनत्व का भाव आता है वह मानते हैं कि इस जग पर सबसे कमज़ोर (दुर्बलतर) का अधिकार है और वह एक ऐसे मानव साम्राज्य की कामना करते हैं, जहाँ सभी को मनुजोचित साधन मिलें

प्रश्न 3: ‘सुखदुःखमें कवि ने सुख और दुःख को क्याक्या उपमाएं दी हैंस्पष्ट करें

उत्तर: ‘सुख-दुःख’ में कवि ने सुख और दुःख को विभिन्न उपमाएं दी हैं:

  • खेल-मिचौनी: सुख-दुःख को जीवन की आँख-मिचौली कहा गया है।
  • घन और शशि: ये दोनों सुख और दुःख के आने-जाने और एक-दूसरे में ओझल होने का प्रतीक हैं ।
  • निशा-दिवा: सुख-दुःख को रात (निशा) और दिन (दिवा) की उपमा दी गई है, जिसमें जग-जीवन सोता-जागता है ।
  • विरह-मिलन: जीवन को विरह और मिलन के आलिंगन के समान, तथा दुःख-सुख को साँझ-प्रभात के मेल के समान बताया गया है ।

प्रश्न 4: ‘सुखदुःखकविता से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर: ‘सुखदुःखकविता से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अविरत (लगातार) सुख और अविरत दुःख दोनों ही उत्पीड़न हैंजीवन की पूर्णता और वास्तविक स्वरूप सुखदुःख की आँखमिचौली और मधुर मिलन में ही निहित हैहमें जीवन में संतुलन बनाकर चलना चाहिए, क्योंकि हँसी और आँसुओं (हासअश्रु) का संगम ही मानवजीवन है

() सप्रसंग व्याख्या करें:
प्रश्न 5: सुन्दर लगती नग्न देह ………. सच्चे
उत्तर: सुन्दर लगती नग्न देह, मोहती नयनमन,
मानव के नाते उर में भरता अपनापन
मानव के बालक हैं ये पासी के बच्चे,
रोमरोम मानव, साँचे में ढाले सच्चे
प्रसंग: यह प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तकहिंदी पुस्तक 12′ में संकलित कवि सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित कवितादो लड़केसे लिया गया है इस अंश में कवि निर्धन बच्चों के प्राकृतिक सौंदर्य को व्यक्त करते हुए उनके प्रति मानवीय अपनत्व का भाव प्रकट करते हैं

व्याख्या: कवि कहते हैं कि उन बच्चों का वस्त्रहीन (नग्न) शरीर उन्हें बहुत सुंदर लगता है और उनके नेत्रों और मन को आकर्षित करता हैमानव होने के संबंध (नाते) से कवि के हृदय (उर) में उनके लिए गहरा अपनापन भर जाता हैकवि स्पष्ट करते हैं कि यद्यपि ये बच्चे पासी जाति के हैं, लेकिन वे अंततः मानव के ही बालक हैंउनका पूरा अस्तित्व (रोमरोम) मानव है और वे मानो सच्चे साँचे में ढलकर आए हैं, जो उनके प्राकृतिक और शुद्ध रूप को दर्शाता है

प्रश्न 6: यह साँझ उषा का आँगन …… जीवन का
उत्तर: यह साँझउषा का आँगन,
आलिंगन विरहमिलन का :
चिर हासअश्रुमय आनन,
रे इस मानवजीवन का
प्रसंग: यह प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तकहिंदी पुस्तक 12′ में संकलित कवि सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित कवितासुखदुःखसे लिया गया है इस अंश में कवि विरोधी भावों के समन्वय को मानव जीवन का वास्तविक दर्शन बताते हैं

व्याख्या: कवि कहते हैं कि मानवजीवन शाम (साँझ) और सुबह (उषा) का आँगन हैजिस प्रकार साँझ और प्रभात का मेल होता है, उसी प्रकार यह जीवन जुदाई (विरह) और मिलाप (मिलन) का आलिंगन (गले मिलना) हैकवि के अनुसार, इस मानवजीवन का चेहरा (आनन) सदैव (चिर) हँसी (हास) और आँसुओं (अश्रु) से भरा रहता हैयह दर्शाता है कि सुख और दुःख, विरह और मिलन, तथा हास और अश्रु का निरंतर संगम ही इस सृष्टि का और मानव जीवन का सार है

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