कक्षा 26 हिंदी – एकांकी: रीढ़ की हड्डी (लेखक: जगदीश चंद्र माथुर)

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कक्षा 12 हिंदी – एकांकी: रीढ़ की हड्डी

लेखक: जगदीश चंद्र माथुर

अभ्यास प्रश्नोत्तर

भाग (क) – लगभग 60 शब्दों में उत्तर दें

1. ‘रीढ़ की हड्डीकिस का प्रतीक है? इसका अपने शब्दों में वर्णन करें।

उत्तर. रीढ़ की हड्डीएकांकी में शील, चरित्र और सामाजिक आधार का प्रतीक है। लेखक के अनुसार, स्त्री समाज रूपी की रीढ़ की हड्डी है, उसका आधार है। इसके अतिरिक्त, यह एकांकी में युवक शंकर की शारीरिक अक्षमता (बैकबोन‘) और उसकी चरित्रहीनता व कायरता का भी प्रतीक है। आधुनिक समाज में नारी की उपेक्षा सामाजिक विसंगतियों का कारण है, इसलिए रीढ़ की हड्डीका मजबूत होना आवश्यक है। यह युवक समाज में दिन-ब-दिन आ रही कमी पर चिंता व्यक्त करता है।

2. “लेकिन घर जाकर ज़रा यह तो पता लगाइए कि आपके लाड़ले बेटे की रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं” – उमा के इन शब्दों का क्या अर्थ है – स्पष्ट करें।”

उत्तर.उमा के इन शब्दों का अर्थ शंकर की शारीरिक और चारित्रिक अक्षमता पर सीधा व्यंग्य है। शंकर लड़कियों के हॉस्टल में ताँक-झाँक करने और नौकरानी के पैरों में पड़कर मुँह छिपाकर भागने जैसी हरकतें करता है, जो उसकी चरित्रहीनता और कायरता का परिचय देती हैं। रीढ़ की हड्डीशील और चरित्र का पर्याय है। इस कथन के माध्यम से उमा, गोपाल प्रसाद (शंकर के पिता) पर यह करारा व्यंग्य करती है कि वे एक खरीददार की तरह उमा में हर गुण देखना चाहते हैं, लेकिन उनका अपना बेटा चरित्र से हीन है और उसकी कोई बैकबोन‘ (रीढ़ की हड्डी/चरित्र) नहीं है।

3. ‘रीढ़ की हड्डीएकांकी में लेखक क्या कहना चाहता है? अपने शब्दों में लिखें।

उत्तर.रीढ़ की हड्डीएकांकी में लेखक जगदीश चंद्र माथुर आधुनिक समाज में लड़की की स्थिति और शादी-विवाह के समय लड़के वालों की वस्तुवादी मानसिकता पर प्रकाश डालना चाहते हैं। लेखक नारी सशक्तिकरण का संदेश देना चाहते हैं। वे बताते हैं कि आज नारी समाज की रीढ़ की हड्डी और आधार है, लेकिन उसकी उपेक्षा सामाजिक विसंगतियों का कारण बन रही है। एकांकी युवक समाज में शील और चरित्र की कमी पर भी चिंता व्यक्त करती है। लेखक उमा के सशक्त चरित्र के माध्यम से वैचारिक क्रांति लाने का सूचक देते हैं।

4. ‘रीढ़ की हड्डीएकांकी के नाम की सार्थकता अपने शब्दों में लिखें।

उत्तर.रीढ़ की हड्डीएकांकी का नाम पूर्णतः सार्थक है। रीढ़ की हड्डीशील, चरित्र और सामाजिक आधार का प्रतीक है। एकांकी में लड़की के माँ-बाप की हताश स्थिति और लड़के वालों की रूढ़िवादी व वस्तुवादी मानसिकता को दर्शाया गया है। मुख्य रूप से, यह नाम लड़के शंकर के चरित्र को सीधे तौर पर इंगित करता है, जिसकी अपनी कोई बैकबोन‘ (चरित्र) नहीं है, वह चरित्रहीन व कायर है। लेखक यह स्थापित करते हैं कि जिस तरह शरीर के लिए रीढ़ की हड्डी आवश्यक है, उसी प्रकार समाज के लिए नारी का सम्मान और हर व्यक्ति का शील-चरित्र ज़रूरी है।

भाग (ख) – लगभग 150 शब्दों में उत्तर दें

5. उमा का चरित्र चित्रण लिखें।

उत्तर.उमा रीढ़ की हड्डीएकांकी की मुख्य पात्र और सशक्त चरित्र की धनी लड़की है।

शिक्षित और स्वाभिमानी: उमा बी.ए. तक पढ़ी-लिखी है। वह लड़कों वालों के सामने बिना टीप-टाप (सजावट) के जाने को तैयार नहीं होती, क्योंकि उसे इन चीज़ों से नफ़रत है, जो उसके स्वाभिमानी स्वभाव को दर्शाती है।

चरित्रवान: उसके पिता (रामस्वरूप) ने भले ही उसे ज़्यादा न पढ़ने देने की गलती की हो, लेकिन उमा शील और चरित्र का पर्याय है, जिसके विपरीत शंकर चरित्रहीन है।

सशक्त आवाज़: उमा आधुनिक नारी का प्रतीक है जो वैचारिक क्रांतिके आने का सूचक है। वह लड़के वालों की मानसिकता पर सवाल उठाती है कि “क्या लड़कियों के दिल नहीं होते? क्या उनके चोट नहीं लगती?”

सामाजिक विसंगतियों पर व्यंग्य: वह लड़के वालों की वस्तु-खरीदने वाली मानसिकता के विरुद्ध आवाज़ उठाती है। उसके आक्रोश और सिसकियों से पाठक सोचने पर विवश होते हैं, जिससे वह समाज में एक अच्छे परिवर्तन की आशा जगाती है।

6. ‘रीढ़ की हड्डी एकांकी में किस सामाजिक समस्या को छुआ गया है – आपके अनुसार इस समस्या का क्या हल है?

उत्तर.रीढ़ की हड्डीएकांकी में मुख्य रूप से आधुनिक समाज में लड़की की स्थिति और विवाह के लिए लड़की देखने के समय लड़के वालों की वस्तुवादी मानसिकता की सामाजिक समस्या को छुआ गया है।

समस्याएँ:

नारी की उपेक्षा: लेखक ने स्पष्ट किया है कि नारी समाज रूपी की रीढ़ की हड्डी है, लेकिन आज उसकी उपेक्षा सामाजिक विसंगतियों का कारण है।

शिक्षा का विरोध: गोपाल प्रसाद जैसे रूढ़िवादी लोग लड़की को ज़्यादा पढ़ा-लिखा (बी.ए. से आगे) नहीं चाहते, क्योंकि उन्हें कम पढ़ी-लिखी लड़की चाहिए।

चरित्रहीनता: एकांकी युवक समाज में शील और चरित्र की कमी को एक चिंता का विषय बताती है, जिसका उदाहरण शंकर का चरित्र है।

आपके अनुसार हल

समस्या का हल लेखक ने उमा के सशक्त चरित्र और वैचारिक क्रांति के माध्यम से सुझाया है। इस समस्या को सुलझाने के लिए:

युवक समाज में चरित्र (रीढ़ की हड्डी) की कमी को दूर करना होगा, जिसके लिए नैतिक मूल्यों को स्थापित करना होगा।

लड़कों और उनके पिताओं की वस्तुवादी मानसिकता पर करारा व्यंग्य करके उसे बदलना होगा।

लड़कियों को शिक्षा के लिए पूरा समर्थन देना चाहिए (जैसे रामस्वरूप इंटर के बाद बी.ए. करवाते हैं, पर छुपाते हैं) और नारी सशक्तिकरण के संदेश को फैलाना चाहिए।

7. ‘शंकरशारीरिक व चरित्र की दृष्टि से रीढ़ की हड्डी से विहीन है, आपका इस बारे में क्या विचार है – शंकर का चरित्र-चित्रण लिखें।

उत्तर.शंकर एकांकी में रूढ़िवादी, चरित्रहीन और कायर युवक का प्रतिनिधित्व करता है। लेखक के विचारानुसार:

चरित्रहीन व कायर: शंकर कायर और चरित्रहीन है। वह लड़कियों के हॉस्टल में ताँक-झाँक करता है और पकड़े जाने पर नौकरानी के पैरों में पड़कर मुँह छिपाकर भागता है।

रीढ़ की हड्डी से विहीन: गोपाल प्रसाद स्वयं शंकर को झुककर बैठने पर बैकबोनसीधी करने को कहते हैं। रामस्वरूप के पूछने पर कि कोर्स खत्म होने में कितना समय है, वह साल दो सालका मार्जिन रखता है, जो उसकी पढ़ाई के प्रति अनिश्चितता को दर्शाता है।

पिता पर आश्रित: शंकर अपने पिता गोपाल प्रसाद के साथ उमा में हर गुण देखना चाहता है, ठीक वैसे ही जैसे एक खरीददार किसी वस्तु को खरीदने से पहले करता है। वह विवाह को बिज़नेसकी तरह देखता है, जहाँ उसके अपने कोई स्पष्ट विचार नहीं हैं।

पढ़ा-लिखा, पर कुंठित: वह बी.एस.सी. के बाद मेडिकल कॉलेज में पढ़ता है, लेकिन फिर भी कहता है कि “शादी का सवाल दूसरा है, तालीम का दूसरा”। यह बताता है कि उसकी शिक्षा भी उसके व्यक्तित्व को प्रगतिशील नहीं बना पाई है।

अतः, शंकर न केवल शारीरिक रूप से (झुकी हुई कमर) बल्कि चारित्रिक रूप से भी रीढ़ की हड्डीसे विहीन है।

8. ‘रीढ़ की हड्डीएकांकी के पुरुष पात्रों की तीन-तीन चारित्रिक विशेषताएँ लिखें।

उत्तर.1. रामस्वरूप (लड़की का पिता)

विवश एवं हताश: वे अपनी बेटी के विवाह के लिए गोपाल प्रसाद और शंकर की दकियानूसी (रूढ़िवादी) बातों को सहते हैं। वे स्वयं को उनका सेवक कहते हैं, जो उनकी मजबूरी दर्शाता है।

प्रगतिशील विचारों वाला (दबा हुआ): वे खुद पढ़े-लिखे हैं और उमा को बी.ए. तक पढ़ाते हैं। वे गोपाल प्रसाद के ख्यालों को दकियानूसीमानते हैं।

छिपाव और भ्रम का सहारा लेने वाला: वे गोपाल प्रसाद के सामने उमा की शिक्षा छिपाते हैं। वे पत्नी प्रेमा को भी इस बात को न उगलने की चेतावनी देते हैं।

2. गोपाल प्रसाद (लड़के का पिता)

रूढ़िवादी और दकियानूसी: वे लड़की को ज़्यादा पढ़ी-लिखी (बी.ए. से ज़्यादा) नहीं चाहते, भले ही वे खुद वकील और पढ़े-लिखे हों।

वस्तुवादी (व्यावसायिक) सोच: वे विवाह को बिज़नेस‘ (व्यापार) की तरह मानते हैं और उसी की बातचीत करना चाहते हैं।

अहंकारी और अनुभवी: वे अपनी आवाज़ और आँखों से लोक-चतुराई टपकने वाले और अनुभवी महाशय लगते हैं। वे अपने ज़माने की प्रशंसा करते हैं और वर्तमान की कमियाँ बताते हैं।

3. शंकर (लड़का)

चरित्रहीन और कायर: वह लड़कियों के हॉस्टल में ताँक-झाँक कर चुका है और नौकरानी के पैरों में पड़कर भागा था, जो उसकी कायरता और चरित्रहीनता का प्रमाण है।

कमजोर व्यक्तित्व: वह अपने पिता के सामने झुककर बैठता है और उसके दोस्त बैकबोनन होने का मज़ाक उड़ाते हैं।

पिता पर आश्रित: वह शादी जैसे महत्वपूर्ण सवाल पर भी अपने पिता की हाँ में हाँ मिलाता है और विवाह को बिज़नेस‘ (खरीद-बिक्री) की तरह देखता है।

भाग (ग) – सप्रसंग व्याख्या करें

1. “जनाब मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं, शेर के बाल होते हैं, शेरनी के नहीं।”

प्रसंग

यह पंक्तियाँ जगदीश चंद्र माथुर द्वारा लिखित एकांकी रीढ़ की हड्डीसे ली गई हैं, जो हिंदी पाठ पुस्तक 12′ से संकलित है। यह संवाद गोपाल प्रसाद (शंकर के पिता) ने रामस्वरूप (उमा के पिता) से तब कहा, जब वह अपनी लड़की के बारे में बातचीत कर रहे थे। इन पंक्तियों के माध्यम से गोपाल प्रसाद पुरुष और स्त्री के बीच एक रूढ़िवादी, असमान भेद स्थापित करते हुए, यह सिद्ध करना चाहते हैं कि स्त्री का पढ़ा-लिखा होना अनावश्यक है।

व्याख्या

इस कथन के द्वारा गोपाल प्रसाद अपनी रूढ़िवादी और दकियानूसी मानसिकता को प्रकट करते हैं। वे कहते हैं कि जिस प्रकार मोरनी और शेरनी की तुलना में मोर और शेर में विशिष्टता (पंख, बाल) होती है, उसी प्रकार पुरुषों का ज्ञानवान, पढ़ा-लिखा होना आवश्यक है, जबकि लड़कियों के लिए कम शिक्षा ही पर्याप्त है। वे अप्रत्यक्ष रूप से यह संकेत देते हैं कि पुरुषों की बुद्धिमत्ता, अनुभव और शिक्षा ही समाज में महत्वपूर्ण है, जबकि स्त्रियों का कार्य केवल घर-गृहस्थी तक सीमित है। उनका यह तर्क लड़कियों की उच्च शिक्षा और उनकी व्यक्तित्व की गरिमा को नकारता है, जो विवाह को व्यवसाय मानने वाली उनकी सोच को दर्शाता है।

2. “जब कुर्सी-मेज़ बिकती है, तब दुकानदार कुर्सी-मेज़ से कुछ नहीं पूछता केवल खरीददार को दिखला देता है। पसन्द आ गई तो अच्छा है, वरना वे रहे?”

प्रसंग

यह पंक्तियाँ जगदीश चंद्र माथुर द्वारा लिखित एकांकी रीढ़ की हड्डीसे ली गई हैं, जो हिंदी पाठ पुस्तक 12′ से संकलित है। यह संवाद गोपाल प्रसाद ने रामस्वरूप से तब कहा, जब वे रामस्वरूप की लड़की उमा को देखने के लिए आए थे। इन पंक्तियों में वे शादी को बिजनेस‘ (व्यापार) बताते हुए लड़की को एक वस्तु की तरह देखने की अपनी मानसिकता व्यक्त कर रहे हैं।

व्याख्या

गोपाल प्रसाद विवाह जैसे पवित्र संबंध को एक व्यावसायिक लेन-देन (बिज़नेस‘) के रूप में देखते हैं। इस कथन में वे लड़की को कुर्सी-मेज़जैसी एक निर्जीव वस्तु के समान मानते हैं। उनका आशय है कि जिस प्रकार एक दुकानदार ग्राहक को कुर्सी-मेज़ दिखाते समय उससे कोई बातचीत नहीं करता, केवल ग्राहक की पसंद का ध्यान रखता है, उसी प्रकार लड़की (उमा) को चुपचाप लड़के वालों के सामने आना चाहिए। यदि वस्तु (लड़की) उन्हें पसंद आ गई तो ठीक है, अन्यथा वे दूसरी जगह चले जाएँगे। यह कथन गोपाल प्रसाद की वस्तुवादी मानसिकता और उनके अहंकार को दर्शाता है, जो आधुनिक समाज में नारी की स्थिति और उसके सम्मान पर करारा व्यंग्य है।

3. “जी हाँ, और मेरी बेइज़्ज़ती नहीं होती जो आप इतनी देर से नाप-तोल कर रहे हैं?”

प्रसंग

यह पंक्तियाँ जगदीश चंद्र माथुर द्वारा लिखित एकांकी रीढ़ की हड्डीसे ली गई हैं, जो हिंदी पाठ पुस्तक 12′ से संकलित है। यह संवाद उमा (लड़की) ने गोपाल प्रसाद (लड़के के पिता) से तब कहा, जब वे एक खरीददार की तरह उससे सवाल पर सवाल पूछ रहे थे और उसकी कला (गाना-बजाना) पर अपनी राय दे रहे थे। यह उमा के वैचारिक क्रांति और नारी सशक्तिकरण की भावना को दर्शाता है।

व्याख्या

इस कथन के माध्यम से उमा, लड़के वालों की वस्तुवादी और अहंकारपूर्ण मानसिकता पर करारा व्यंग्य करती है। वह उनसे पूछती है कि जब वे उसे एक वस्तु की तरह नाप-तोल‘ (जाँच-परख) रहे हैं, तो क्या इससे उसकी कोई बेइज़्ज़ती नहीं हो रही है? उमा का यह सवाल गोपाल प्रसाद की उस सोच पर सीधा प्रहार है, जिसमें वे लड़की को एक निर्जीव वस्तु मानते हैं और उसकी भावनाओं या सम्मान की कोई परवाह नहीं करते। यह संवाद उमा के सशक्त चरित्र और उसके आक्रोश को प्रकट करता है, जो इस बात का प्रतीक है कि लड़कियाँ अब चुपचाप अपमान सहन नहीं करेंगी। यह वैचारिक क्रांति के आने का सूचकहै।

 

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