पाठ 14: कच्चे रंग (कविता) – गीता डोगरा

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पाठ 14: कच्चे रंग (कविता) – गीता डोगरा

सप्रसंग व्याख्या

पद्यांश 1 खो गया है मेरा गाँव

वह पगडंडी

देवदार के पेड़

वह जंगल भी

जहाँ से गुजरते गुजरते

कविता मुझ से मिली थी

प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक हिंदी पुस्तक 12′ में से कवयित्री गीता डोगरा द्वारा रचित कविताकच्चे रंगसे लिया गया है इन पंक्तियों में कवयित्री अपने अतीत के सहज, प्राकृतिक और प्रेरणादायक परिवेश के खो जाने पर दुःख व्यक्त करती हैं

व्याख्या: कवयित्री अफ़सोस जताती हैं कि उनका अपना गाँव अब खो चुका है वह पगडंडी भी खो गई है, और वे देवदार के पेड़ वाला जंगल भी अब नहीं रहा यह वही स्थान था जहाँ से गुजरते हुए उन्हें कविता मिली थी कवयित्री इन पंक्तियों के माध्यम से यह बताती हैं कि प्रकृति और सहजता के माहौल में ही उन्हें रचनात्मक प्रेरणा प्राप्त होती थी, जो अब समाप्त हो चुकी है

पद्यांश 2 अब शहर ……

सड़केंगलियाँ हैं

खो गए हैं पर्वत भी

जो गुपचुप आवाज देते थे मुझे

तो मैं थकी हारी

धूल सने पाँव सहित

उसकी आगोश में सिमट जाती थी

प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक हिंदी पुस्तक 12′ मेंसे कवयित्री गीता डोगरा द्वारा रचित कविताकच्चे रंगसे लिया गया है इन पंक्तियों में कवयित्री शहरी जीवन की थकावट की तुलना अतीत के प्राकृतिक और शांत आश्रय से करती हैं

व्याख्या: कवयित्री कहती हैं कि अब उनके पास केवल शहर की सड़कें और गलियाँ ही बची हैं वे पर्वत भी खो गए हैं, जो उन्हें चुपके से आवाज़ दिया करते थे जब कवयित्री थक जाती थीं और उनके पैर धूल से सने होते थे, तो वे उन पर्वतों की गोद (आगोश) में सिमट जाया करती थीं, जहाँ उन्हें सहजता से शांति और विश्राम मिलता था

पद्यांश 3: मेरा वह पुराना घर

नानकशाही ईंट वाला

जहाँ हर वर्ष बड़ी माँ

कच्चे रंगों से लिखती थी

सबका नाम

प्यार से चूमती थी मेरा माथा

मेरे हाथ…..

प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक हिंदी पुस्तक 12′ में से कवयित्री गीता डोगरा द्वारा रचित कविताकच्चे रंगसे लिया गया है इन पंक्तियों में कवयित्री अतीत के उस घर और रिश्तों का वर्णन करती हैं जो सहज प्रेम और अपनत्व से भरे थे

व्याख्या: कवयित्री अपने पुराने घर को याद करती हैं, जो बहुत पुरानी और छोटे आकार की नानकशाही ईंट वाला था इस घर में हर वर्ष बड़ी माँ सच्चे और सहज कच्चे रंगों से परिवार के सबका नाम लिखती थींयह घर अपनत्व से भरा था, जहाँ कोई उन्हें प्यार से माथा और हाथ चूमती थी यह पद्यांश अतीत के सहज, निःस्वार्थ प्रेम को दर्शाता है

पद्यांश 4: वे रिश्ते भी खो गए

अब रहता है वहाँ भी

सीमेंट पत्थर का आदमी

जो रिश्तों को तराजू पर

तोलता है

और पटक देता है….

छितरेछितरे हो

मैं वहाँ से भी लौट आई

प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक हिंदी पुस्तक 12′ में से कवयित्री गीता डोगरा द्वारा रचित कविताकच्चे रंगसे लिया गया है इन पंक्तियों में कवयित्री वर्तमान में रिश्तों के व्यावसायीकरण और मानवीय कठोरता पर दुख व्यक्त करती हैं

व्याख्या; कवयित्री कहती हैं कि प्यार और अपनत्व वाले वे सच्चे रिश्ते भी खो गए हैंअब वहाँ सीमेंट पत्थर का आदमी‘ (अर्थात मुर्दादिल आदमी) रहता है यह कठोर व्यक्ति रिश्तों को तराजू पर तौलता है (मूल्यांकन करता है) और फिर उन्हें पटक देता है कवयित्री बताती हैं कि इस हृदयहीन वातावरण से वे स्वयं भी बिखरकर (छितरेछितरे हो) वहाँ से लौट आई हैं

पद्यांश 5 सब कुछ बदल गया

जंगल पर्वत, पगडंडी

घर भी

शेष बचीं मैं

आज भी खोजती हूँ कच्चे रंग

जिससे लिख पाऊँ

मैं उन सबके नाम

जो मेरे अपने हो सके

और सोचती हूँ

गलती से जन बैठूँ

कोई सीमेंट पत्थर का आदमी

कि कहाँ

मेरी बेटी भी छितरे छितरे हो

लौट जाए

मेरी दहलीज से….

सच कितना डरती हूँ मैं

प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक हिंदी पुस्तक 12′ में से कवयित्री गीता डोगरा द्वारा रचित कविताकच्चे रंगसे लिया गया है यह कविता का अंतिम भाग है, जिसमें कवयित्री संपूर्ण परिवर्तन पर चिंता व्यक्त करती हैं और भविष्य में रिश्तों के टूटने का गहरा व्यक्तिगत भय प्रकट करती हैं

व्याख्या: कवयित्री इस बात को दोहराती हैं कि जंगल, पर्वत, पगडंडी और घर भीसब कुछ बदल गया है, और अब केवल वे स्वयं ही बाकी बची हैं वह आज भी सच्चे अपनत्व (कच्चे रंग) की तलाश कर रही हैं, ताकि वे उन लोगों के नाम लिख सकें जो उनके अपने बन सकें कवयित्री डरती हैं कि कहीं वह गलती सेसीमेंट पत्थर का आदमी‘ (मुर्दादिल व्यक्ति) जन बैठूँ (जन्म दे दूँ) उनका सबसे बड़ा डर यह है कि कहीं उनकी बेटी भी बिखरकर उनकी चौखट (दहलीज) से खाली हाथ वापस लौट जाए यह अंतिम पंक्ति कवयित्री के गहरे और मार्मिक भय को दर्शाती है

() लगभग 40 शब्दों में उत्तर दें

प्रश्न 1. ‘कच्चे रंगकविता का सार अपने शब्दों में लिखो

उत्तर यह कविता भौतिकवादी संस्कृति के बढ़ते परिवेश में मानवीय रिश्तों की स्थिति को स्पष्ट करती है कवयित्री को इस बात का अफ़सोस है कि उनका अतीत पूरी तरह से टूट चुका है और उन्हें इस बात की फ़िक्र है कि कहीं भविष्य वर्तमान से भी टूट जाए यह रचना प्रतीकों और बिम्बों के सहारे खो रहे मानवीय रिश्तों के महत्त्व को उजागर करने का प्रयास करती है

प्रश्न 2. ‘कच्चे रंगकविता का शीर्षक कहाँ तक सार्थक है?

उत्तरकच्चे रंगशीर्षक पूरी तरह सार्थक है ये रंग अतीत के सहज, सच्चे और प्रेमपूर्ण रिश्तों का प्रतीक हैं इसके विपरीत, वर्तमान में सीमेंट पत्थर का आदमी‘ (मुर्दादिल) रिश्तों को तराजू पर तौलता और पटक देता है कवयित्री आज भी सच्चे अपनत्व को लिखने के लिए उन कच्चे रंगों की खोज में हैं

प्रश्न 3. ‘कच्चे रंगकविता का भाव स्पष्ट करें

उत्तर कविता का मुख्य भाव अतीत की सहजता (गाँव, जंगल) के नुकसान और वर्तमान के कठोर, भौतिकवादी माहौल के प्रति चिंता व्यक्त करना है रिश्ते अब तराजू पर तौले जाते हैं कवयित्री का गहरा डर है कि यह हृदयहीनता कहीं उनकी अपनी बेटी को भी बिखेर (छितरेछितरे) दे और वह खाली हाथ लौट जाए

 

प्रश्न 4. ‘कच्चे रंगकविता में कौनकौन से मानवीय रिश्तों का विवरण है?

उत्तर कविता में पुरानी बड़ी माँ का विवरण है, जो नानकशाही ईंटों वाले घर में कच्चे रंगों से नाम लिखती थीं उस व्यक्ति का भी उल्लेख है जो प्यार से कवयित्री का माथा चूमती थी सामान्य रूप से वे सच्चे रिश्ते भी खो गए हैं, जिनका आज सीमेंट पत्थर का आदमी‘ (मुर्दादिल) मूल्यांकन करता है अंत में, अपनी बेटी के भविष्य को लेकर चिंता व्यक्त की गई है

() सप्रसंग व्याख्या करें

प्रश्न 1. अब शहर ……………… सिमट जाती थी।

प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक हिंदी पुस्तक 12में से कवयित्री गीता डोगरा द्वारा रचित कविता कच्चे रंगसे लिया गया है। इन पंक्तियों में कवयित्री शहरी जीवन की थकावट की तुलना अतीत के प्राकृतिक और शांत आश्रय से करती हैं।

व्याख्या: कवयित्री कहती हैं कि अब उनके पास केवल शहर की सड़कें और गलियाँ ही बची हैं। वे पर्वत भी खो गए हैं, जो उन्हें चुपके से आवाज़ दिया करते थे। जब कवयित्री थक जाती थीं और उनके पैर धूल से सने होते थे, तो वे उन पर्वतों की गोद (आगोश) में सिमट जाया करती थीं, जहाँ उन्हें सहजता से शांति और विश्राम मिलता था।

प्रश्न 2. सब कुछ बदल गया……………… कितना डरती हूँ मैं।

प्रसंग: प्रस्तुत पद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक हिंदी पुस्तक 12में से कवयित्री गीता डोगरा द्वारा रचित कविता कच्चे रंगसे लिया गया है। यह कविता का अंतिम भाग है, जिसमें कवयित्री संपूर्ण परिवर्तन पर चिंता व्यक्त करती हैं और भविष्य में रिश्तों के टूटने का गहरा व्यक्तिगत भय प्रकट करती हैं।

व्याख्या: कवयित्री इस बात को दोहराती हैं कि जंगल, पर्वत, पगडंडी और घर भी—सब कुछ बदल गया है, और अब केवल वे स्वयं ही बाकी बची हैं। वह आज भी सच्चे अपनत्व (कच्चे रंग) की तलाश कर रही हैं, ताकि वे उन लोगों के नाम लिख सकें जो उनके अपने बन सकें। कवयित्री डरती हैं कि कहीं वह गलती से सीमेंट पत्थर का आदमी‘ (मुर्दादिल व्यक्ति) जन न बैठूँ (जन्म न दे दूँ)। उनका सबसे बड़ा डर यह है कि कहीं उनकी बेटी भी बिखरकर उनकी चौखट (दहलीज) से खाली हाथ वापस न लौट जाए। यह अंतिम पंक्ति कवयित्री के गहरे और मार्मिक भय को दर्शाती है।

 

 

 

 

 

 

 

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